जिसकों कहतें थे हम हमसफ़र अपना।

जिसकों कहतें थे हम हमसफ़र अपना।

वो तो था ही नही कभी रहगुज़र अपना।।

,

तुमको मुबारक हो भीड़ इस दुनिया की।

हम काट लेंगे तन्हा ही ये सफर अपना।।

,

भूल गए हो यक़ीनन तुम अपने वादे सारे।

पर उदास रहता है वो गवाह शज़र अपना।।

,

न कोई मुन्तज़िर है न है कोई आहट तेरी।

फिर भी सजाता है कोई क्यू घर अपना।।

,

ऐ बादल बरसों ऐसे भीगों डालो सबकुछ।

की साहिल जलता बहुत है ये शहर अपना।

@@@@RK@@@@


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 
यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|
 

Leave a Reply