छल

ख्वाबों में आकर वो हमसे रोज़ मिलते रहे,
और हम मासूम बस उनसे यूँहीं छलते रहे।।
राही (अंजाना)

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

6 Comments

  1. Bidya - July 31, 2018, 10:39 am

    Badhiya h

  2. ज्योति कुमार - July 31, 2018, 8:51 pm

    Waah

  3. Neha - July 31, 2018, 8:52 pm

    Nice

Leave a Reply