चुभन

नज़रो में हो कंकड़ तो,
रानाई चुभती है..
भरी बज़्म में चस्पा
तन्हाई चुभती है..
जिस रिन्द को मयस्सर हो
बस कफ़स की फर्श..
उसकी आँखों मे आसमान की
ऊंचाई चुभती है..
जो जिस्म सतह पे खेल के,
हार गए खुद से..
उन्हें रूह की
गहराई चुभती है..
जिन सफहो को है आदत,
पानी से लिखे हर्फ़ों की..
उन्हें ये रंगीन..
रोशनाई चुभती है..
तन्हा रहने की तलब..
इस कदर है सबको..
अब परछाई को भी परछाई
चुभती है।।

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8 Comments

  1. देव कुमार - June 15, 2018, 10:19 pm

    Asm

  2. Mithilesh Rai - June 15, 2018, 10:43 pm

    Very good

  3. राही अंजाना - June 16, 2018, 2:39 pm

    बढ़िया

  4. ashmita - June 16, 2018, 3:00 pm

    nice poem

  5. Neelam Tyagi - June 16, 2018, 3:12 pm

    बहुत खूब प्रतिमा

  6. Neha - June 17, 2018, 10:00 pm

    Nice

  7. देव कुमार - June 18, 2018, 3:29 pm

    Bahut khoob

  8. Jagmohan kandari - July 4, 2018, 11:57 am

    👌

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