चलना संभल कर यहां जर्रे जर्रे में है धोखा

चलना संभल कर यहां जर्रे जर्रे में है धोखा।
अब सांसे भी सांसों को देता रहा है धोखा।

यूं जिंदगी को न कर इस कदर रुसवा यहां
हर गली हर चौराहे पर पसरा है धोखा।

वो सियासी नेता हो या हो कोई नन्हा बच्चा
हर इंसान के रग-रग में छिपा है धोखा ।

पानी की बुलबुले सी रह गई है जिंदगी,यहां
जिन्दा खुद जिन्दगी को देता रहा है धोखा ।

रात काली उजियारे सा महफिल है “योगेंद्र”
दिन निकला तो है,पर उजाले का है धोखा।

योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोड़ा,छ०ग०

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4 Comments

  1. Ashok babu Mahour - March 8, 2018, 11:52 am

    बहुत बढ़िया

  2. Priya Gupta - March 8, 2018, 5:59 pm

    Lagta Aapko bahut dokhe mile he…by the way. Well written

    • Yogi Nishad - March 9, 2018, 1:20 pm

      धोखे मे जी रहे है
      गम पी जख्म सी रहे है
      सादर आभार जो आपको रचना पसंद आई।

  3. राही अंजाना - July 31, 2018, 11:15 pm

    Waah

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