क्यों गरीबी की चादर में पैरों को फैलाना पड़ता है

क्यों गरीबी की चादर में पैरों को फैलाना पड़ता है

क्यों गरीबी की चादर में पैरों को फैलाना पड़ता है,

क्यों चन्द ख़्वाबों को इस दिल में दबाना पड़ता है,

खेल-खिलौने गुड़िया गुड्डे और वो रेलगाड़ी छोड़कर,

क्यों रात दिन इस बचपन को रिक्शा चलाना पड़ता है।।
राही (अंजाना)

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

1 Comment

  1. मनप्रीत गाबा - September 28, 2018, 1:40 am

    वाह खूब

Leave a Reply