क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..
क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी..
छुपकर तुमसे और किसी से पहले बात तो मैंने की थी..
एक भरोसा था शीशे सा जो चटकाकर तोड़ दिया था..
संदेहों के बीच तुझे जब तन्हा मैंने छोड़ दिया था..
अपना सूरज आप डुबोकर पहले रात तो मैंने की थी..
इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी..
क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..
क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

अब कर्मों की मार पड़ी है तो फिर तुमसे कैसा बैर..
अपनी बारी आन पड़ी है तो फिर तुमसे कैसा बैर..
कैसा बैर रखूं मैं बोलो कैसा अब विद्वेष रखूं..
हम दोनों में किसके दिल के टूटे अब अवशेष रखूं..
अपने ही उपवन में शोलों की बरसात तो मैंने की थी..
इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी..
क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..
क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

#सोनित

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 
यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|
 
सावन का लक्ष्य है, कविता के लिए एक मंच स्थापित करना, जिस पर कविता का प्रचार व प्रसार किया जा सके और मानवता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया जा सके| यदि आप सावन की इस उद्देश्य में मदद करना चाहते है तो नीचे दिए विज्ञापन पर क्लिक करके हमारी आर्थिक मदद करें|

 

Related Posts

तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले

तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले

तुम होते तो शायद

आ जाओ कहाँ हो तुम

रचनाकार

4 Comments

  1. Profile photo of Panna

    Panna - October 8, 2016, 3:05 pm

    bahut khoob

  2. Profile photo of Neelam Tyagi

    Neelam Tyagi - October 7, 2016, 5:34 am

    Nice

Leave a Reply