कोई अपना सा

मन के दर्पण पर कुछ प्रतिबिम्ब सा छा गया
कुछ कहा नही उसने पर फिर भी कुछ कह गया

जैसे भोर में कोई नया पुष्प खिल गया
हलचल सी हुई फिर हृदय के कोने में
अपनी मधुर सी मुस्कान में जैसे वो मुझे छल गया

उसके आने की आहट का बेसब्री से इंतज़ार किया
और जब वो आया तो अंग अंग खिल गया
मन मे बहुत कुछ था बताने को परंतु
होंठ न खुल सके और वो बिना बोले ही बहुत कुछ कह गया

सुध बुध खो बैठी उसकी झलक देखने को
और बातो ही बातों में वक़्त बेवफा हो गया
ख़्वाह्माखवाह मुस्कुराने लगी मैं
पता चला तो नाम बदनाम हो गया
इश्क़ में जिये तो डूबकर जिये हम
और जमाना हमे आशिक़ कह गया

Previous Poem
Next Poem

सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कहानी प्रतियोगिता


समयसीमा: 24 फ़रवरी (सन्ध्या 6 बजे)

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Leave a Reply