कुछ सोच रहा हूं मैं

कुछ सोच रहा हूं मैं,
कुछ खोज रहा हूं मैं।

जिंदगी के इन घने जंगलों में,
खुशी की कुछं टहनियां ढूंढ रहा हूं मैं।

वह हसीन वादियां कहीं खो सी गई हैं,
नदियों के किनारों का वह शोर थोड़ा थम सा गया है।
तेज हवाओं में उन पत्तियों का नाचना गाना
कहीं सो सा गया है,
बस उन्हीं के खुशी से झूमने का इंतजार कर रहा हूं मैं।।

जिंदगी की लंबी दौड़ में,
थोड़ा सा पीछे रह गया हूं।
संभलते संभलते कहीं खो सा गया हूं,
बस उसी खोए हुए खुद को कहीं ढूंढ रहा हूं।।

कुछ सोच रहा हूं मैं,
कुछ खोज रहा हूं मैं।।

Previous Poem
Next Poem
Spread the love

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

5 Comments

  1. Neha - July 3, 2018, 7:01 pm

    Nice

  2. ज्योति कुमार - July 3, 2018, 10:09 pm

    Super

  3. राही अंजाना - July 4, 2018, 3:27 pm

    वाह

  4. Chetan Pujara - July 4, 2018, 6:08 pm

    धन्यवाद

  5. Chetan Pujara - July 4, 2018, 6:08 pm

    Thank you

Leave a Reply