किताब हो जाओ

नेट के इस ज़माने में ऐ ” प्रेम ”
ख़ुद ही तुम इक किताब हो जाओ ….

पंकजोम ” प्रेम “

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तराश लेता हूँ सामने वाले की फितरत ...... बस एक ही नज़र में ..... जब कलम लिख देती है , हाल - ए - दिल .... तो कोई फ़र्क नहीं रहता ..... जिंदगी और इस सुख़न - वर में....

4 Comments

  1. Panna - April 25, 2018, 11:19 am

    बेहतरीन प्रेम जी

  2. पंकजोम " प्रेम " - May 8, 2018, 9:04 pm

    शुक्रिया पन्ना जी , शुक्रिया मिथिलेश दादा

  3. राही अंजाना - July 31, 2018, 10:34 pm

    Waah

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