कविता

” मन के मोती…”

पानी के बुलबुले से
माला के मोतियों से
बिखरता है टूट जाता है |
बनता है मन का मोती
बन कर के फूट जाता है ||
स्वप्नों में साथियों से
मिलना बिछड भी जाना !
समझा नही मै अब तक
जो साथ ही सोया है
ओ साथ छूट जाता है |
कुछेक क्षंण में ही मन
अंदर से टूट जाता है ||
फिर देखकर जठर भी
उलझन में है फंस जाता !
आखिर ये स्वप्न में क्यों
ये तथ्य है दिखाता !!
जो कल्पना में पाते
स्वप्नों में सच हो जाता !
पानी पे चल रहा जो
सूखे में डूब जाता !!
देखा मैं स्वप्न में कि
लहरों पर चल रहे है !
मेरे चरण रज उठ कर
नभ में बिखर रहे है !!
हूँ भागता घर लेकिन
ये पाँव फंस गये है !
ये पत्थरों के दलदल में
कैसे धँस गये है !!
अस्तित्व स्वप्न का है
अनंत मन के मोती
कभी माला टूट जाती
मोती भी बिखर जाते !
बरसात में मुरझाते
पतझड में निखर जाते !!
उपाध्याय…


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 
यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|
 

1 Comment

  1. Profile photo of Anika Chaudhari

    Anika Chaudhari - July 28, 2016, 1:02 pm

    behtareen ji

Leave a Reply