कविता:- सफर

जीवन के इस सफ़र में
प्रकृति ही है जीवन हमारा,
बढ़ती हुई आबादी में किंतु
हर मनुष्य फिर रहा मारा-मारा॥

मनुष्य इसको नष्ट कर रहा है
जिंदगी अपनी भ्रष्ट कर रहा है,
करके नशा देता भाषण
क्या नहीं जानता नशा नाश का कारण॥

मान प्रतिष्ठा या चाहे हो शोहरत
है निर्भर सब धन दौलत पर,
मान प्रतिष्ठा चाहे हो शोहरत
है निर्भर सब धन दौलत पर,
बनकर ब्रहमचारी सामने इस जग के
निगाहें रखता हर औरत पर॥

हर प्राणी ईश्वर की रचना
फिर भी प्राणी का प्राणी से बैर,
हर प्राणी ईश्वर की रचना
फिर भी प्राणी का प्राणी से बैर,
मतलब आने पर दुश्मन भी अपने
और मतलब जाने पर अपने भी गैर॥

मानव की है फितरत इतनी
दुनिया को बांटें धर्म का ज्ञान,
मानव की है फितरत इतनी
दुनिया को बांटें धर्म का ज्ञान,
मंदिर मस्जिद के नाम पे लेकिन
है लड़ता मरता हर इंसान
है लड़ता मरता हर इंसान॥॥॥

धन्यवाद॥॥

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2 Comments

  1. सीमा राठी - June 24, 2017, 12:39 pm

    Very nice poetry

  2. Onyiro Promise - August 1, 2017, 4:00 pm

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