कच्ची पेंसिल

कच्ची पेंसिल

आज कल के महंगे बॉलपेन से ,
मेरी कच्ची पेंसिल अच्छी थी ||
बॉलपेन की रफ़्तार से ,
मेरी पेंसिल की धीमी लिखावट अच्छी थी ||

गलती पर रब्बर पेंसिल का साथ ,
होता गुरु शिष्ये का आभास ||
गुरु की डाट पर वो रब्बर से मिटाना ,
लिखे पर फिर से पेंसिल घुमाना ,
सिखने तक ये सब दोहराना ,
वो बचपन की सीख सच्ची थी ||
बॉलपेन के स्थाईत्व से ,
मेरे बचपन की हर गलती अच्छी थी ||

आज कल के महंगे बॉलपेन से ,
मेरी कच्ची पेंसिल अच्छी थी ||

राह में पेंसिल को शार्पनर का साथ ,
दोनों का संग मंज़िल पाने का राग ,
बॉलपेन की खूबसूरती से ,
शार्पनर-पेंसिल की दोस्ती सच्ची थी ||
बॉलपेन के अकेलेपन से ,
मेरी कच्ची पेंसिल अच्छी थी ||

आज कल के बॉलपेन से ,
मेरी कच्ची पेंसिल अच्छी थी ||
~ सचिन सनसनवाल


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अब जितने भी अल्फाज है , मेरी कलम ही मेरे साथ है |

2 Comments

  1. Panna - October 5, 2017, 10:11 pm

    बेहतरीन काव्य रचना, पढ़कर बचपन याद आ गया

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