एहसासों की एक चादर को रोज़ बिछाया करता हूँ

एहसासों की एक चादर को रोज़ बिछाया करता हूँ,
अपने दिल के टुकड़ों को उसपे रोज़ सजाया करता हूँ,

बहुत अन्धेरा लगता है जब कभी मुझे अंतर्मन में,
मैं उसकी एक तस्वीर मात्र को देख उजाला करता हूँ,

चाँद सितारे आसमान के हाथों में न ले पाता हूँ,
तो सिरहाने तकिये पर उसकी यादों को लगाया करता हूँ।।

राही (अंजाना)

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4 Comments

  1. Neha - May 31, 2018, 11:47 am

    Waah

  2. Mithilesh Rai - May 31, 2018, 3:06 pm

    सुंदर प्रस्तुति

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