इश्तेहार सी ज़िंदगी

इश्तेहार सी हो गयी है ज़िंदगी मेरी
जैसी दिखती है, होती नहीं कभी,

सभी के हाथों में सुबह सवेरे पहुंच जाती है,
मगर नज़रों में किसी के होती नहीं कभी,

हर रोज पढ़े जाते है पन्ने इसके इस जहाँ में,
मगर सुलह किसी से होती नहीं कभी॥
राही (अंजाना)

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

2 Comments

  1. शकुन सक्सेना - January 11, 2018, 5:49 pm

    धन्यवाद् भाई जी

  2. Panna - January 11, 2018, 4:57 pm

    Bahut khoob

Leave a Reply