इश्तेहार सी ज़िंदगी

इश्तेहार सी हो गयी है ज़िंदगी मेरी
जैसी दिखती है, होती नहीं कभी,

सभी के हाथों में सुबह सवेरे पहुंच जाती है,
मगर नज़रों में किसी के होती नहीं कभी,

हर रोज पढ़े जाते है पन्ने इसके इस जहाँ में,
मगर सुलह किसी से होती नहीं कभी॥
राही (अंजाना)


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2 Comments

  1. Shakun Saxena - January 11, 2018, 5:49 pm

    धन्यवाद् भाई जी

  2. Panna - January 11, 2018, 4:57 pm

    Bahut khoob

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