आपकी छवि

सर्दियों में धूप मनको
जिस तरह प्यारी लगे ।
आपकी छवि व्यथित मन को
परम सुखकारी लगे ।
मौन रह.अनकही बातें ,
शेष कहने को रहीं ।
जिस जगह से भी गुजरते ,
आप मिल जाते वहीं ।

मुसकराहट मन चुराती ,
कल्पना हो आपकी
क्या पता कब याद आएँ ,
याद बनजारी लगे ।

दर्द भी कैसा दिया है ,
अब दवा लगने लगा ।
आगमन की आस में ,
मन जागरण करने लगा ।
द्वार पलकों के न इक पल,
बंद हो पाते कभी ,
चिर प्रतीक्षा की घड़ी ,
अब ,और भी भारी लगे ।
आ गए वे ,पलक वंदरवार से ,
सजने लगे ।
विपिन से एकांत मन में ,
वाद्य से बजने लगे ।
अश्रु आँखोंके पुलकने -किलकने
अब लग.गए ,
अश्रु की धारा नहीं अब,
तनिक भी खारी लगे ।
ढल गए वे दिवस निर्दय –
नाग से डसने लगे ।
आँख ने आँसू छिपाए ,
पर अधर हँसते रहे ।
मिलनकी बेला , उमंगों की,
हृदय में उर्मियाँ ।
इन क्षणों में , चिर विरह की ,
आज लाचारी लगे ।

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5 Comments

  1. Anirudh sethi - December 16, 2017, 8:44 pm

    अनुपम उपमाओं से परिपूर्ण कविता…सचमुच मन को भा गयी| हमारे साथ शेयर करने के लिए शुक्रिया|

  2. printed yoga matt - August 3, 2018, 5:32 pm

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