आज हर शख्स गुमशुदा है ,बैंक के बाहर।

आज हर शख्स गुमशुदा है ,बैंक के बाहर।

कल कुछ अलग से अनुभव हुए बैंक के बाहर।
कविता के माध्यम से करते हैं शेयर आपके साथ।

आज हर शख्स गुमशुदा है ,बैंक के बाहर।
छोड सब काम छूट्टे के जुगाड में लगा था।
बैक का माहौल गमगीन नहीं, उत्सव सा हसीन था।
हर शख्स हैसियत से मुक्त, छुट्टे की ताक में तल्लीन,
लाइन में सब बराबर,ना अमीर ना गरीब।
हिन्दू ना मुस्लिम,ब्राहमण ना अछूत।
सब बस एक ही सूत्र में ,एक ही जनून।
भेदभाव लेसमात्र नहीं,समसता उतरी जमीं ,
ऐसे लाइन मे तल्लीन ,कि अहसास ही नहीं ,
कि कोई परिचित,जो कभी जाने जिगर थी।
मुद्दतों बाद वो बैंक में लाइन म़े लगी मिली,
होता कोई और दिन हम आगे पीछे दौडते।
अब आज मौहब्बत तकै, कि नोट बदलें।
दिल को कर मजबूत हम नोट की उलझन मे डूबे,
कि हुई घोषणा बैंक में नोट खत्म हुए।
सुबह से हो गयी दोपहर,भूखे प्यासे स्वस्थ, बीमार,
घोषणा से सभी हुए मायूस।
हमने सोचा चलो ,
अब आँखों को ही सैेकने का काम कर लेते हैं,
चलो आज का दिन यूँ ही सार्थक कर लेते हैं।
दिखी अरसे बाद जो मोहतरमा ,
उनसे ही आँखे चार कर लेते हैं।
दे गया गच्चा यहाँ भी नसीब।
बेवफा कह जा चूकी थी नाजनीन।
वाह री किस्मत ,वाह मोदी जी,
जय मेरे भारत महान ।
सावित्री राणा
काव्य कुँज।

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