अपने ही सूरज की रोशनी में

अपने ही सूरज की रोशनी में

मोतीसा चमकता

औस का कतरा है आज़ वो

जो कल तक था

अंधेरे में जी रहा।

 

कितनो की आँखों का

तारा है आज़ वो

जो कल तक था

अज़नबी बनकर जी रहा।

 

दूसरो के कितने ही

कटे जख्मों को  है वो सी रहा

लेकिन अपने ग़मों को

अभी भी

वो खुद ही है पी रहा।

 

 

कितनी ही बार जमाने ने

उसे गिराया लेकिन

वो फिरफिर उठकर

जमाने को ही

सँवारने की तैयारी में

है जी रहा।

 

अपने दीया होने का

उसने कभी घमण्ड नहीं किया

तभी तो आज़ वो

सूरज सी चमक लेकर

है जी रहा।

 

 

जीवन कि दिशा पाकर

आज़ वो दुनियाँ को है जीत रहा

जो कल तक था

खुद से ही

हारा हुआ सा जी रहा।

 

अपनी मौत का भी

डर नहीं अब उसको

क्योंकि उसे मालूम हो गया

कि गडकर इन पन्नों पर

वो सदियों तक होगा जी रहा।

 

                                              –   कुमार बन्टी

 

 

Previous Poem
Next Poem
Spread the love

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Related Posts

Talking to a friend

From Death 2 Life

From Death 2 Life

From Death 2 Life

ख़ुशी क्या है ?

3 Comments

  1. Onyiro Promise - August 1, 2017, 3:59 pm

    I am Suvo Sarkar of Emirates NBD bank. I wish to share a business proposal with you, it is in connection with your last name. Please contact me on my email at (sarkarsuvo611@gmail.com) so that i will get back to you soonest.

  2. Neetika sarsar - October 13, 2017, 6:15 pm

    Nice sir

Leave a Reply