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New Poems

सुवह

सुवह सुवह ये गुनगुनी सी , धूप रूप की , लगी है सेंकने ये , शीत -थरथराए तन । उमग जगाने लगी , मन में तपन प्यार की , कि रूप का अलाव तापे , थरथराया , तन और मन । जानकी प्रसाद विवश मेरे अपने मित्रो , मधुर महकते सवेरे की…हर पल तन मन सरसाती ,हार्दिक मंगलकामनाएँ, सपरिवारसहर्ष स्वीकार करें ……। आपका ही , जानकी प्रसाद विवश »

शीर्षक – यादों का पिटारा….!!

शीर्षक – यादों का पिटारा….!!

लम्हे बचें जो जिंदगी के वो खुल के काट लें, जो बाकी रह जाए पिटारे में उसे आपस में बांट लें, वो नीले समंदर के किनारे, पिघले मोती से अंगारे, चल ख्वाहिशों की मुट्ठी में बांध लें, वो रंगीन लम्हे जिंदादिल के सारे, खुशी की चादर ओढ़े पलकों की बाहों में थाम ले, धूप छांव के खेल निराले, कुछ अपनी किस्मत के छाले, अपनी प्रेम की वर्षा कर जिंदगी को जिंदगी का नाम दें, लम्हे बचें जो जिंदगी के वो खुल के काट लें, जो बाकी रह जाए पिटारे में उसे आपस में बांट लें…!!! – राज बैरवा’मुसाफिर’ »

एक शहर….!!

एक शहर….!!

रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया, जिससे उढते धुएँ में इंसानियत का रिसता खुन नज़र आया, हँसते हुए चेहराे में, खुद को झूठा साबित करता हर इंसान जाे पाया, तब कहीं जाकर हमें भी कलयुग की रामलीला का सार समझ आया, रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया….!! कुछ आेर आगे बडे, ताे खंडर हुईं ईमारताें का मलबा था, कहीं दुआ दबी थी , कहीं काेई शिकायत, कहीं ममता बिखरी पड़ी थी, ताे कहीं साेने की ईंटों के नीचे दबा लाचार ईश्वर चिखता पाया, रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया….!!! -राज बैरवा’मुसाफिर’ »

खामोशिया

मेरी खामोशिया खामोश नहीं है जरा इक बार सुन कर तो देखो| »

धुर सुवह का प्यार मित्रो

मधुर सुवह का प्यार मित्रो , मधुर सुवह का प्यार । नहीं मित्रता से बढ़ कोई , है कोई उपहार । सदा मित्रता भाव हृदय में , प्रेम-सुधा बरसाते । रोम रोम हर्षाता , हर पल , दुर्लभ अपनत्व लुटाते । जानकी प्रसाद विवश प्यारे मित्रो , सुमंगलकारी , मधुर सवेरे की अपार प्रेम पगी ,शुभकामनाएँ , सपरिवारसहर्ष स्वीकार करें । आपका अपना मित्र जानकी प्रसाद विवश »

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